Sunday, 10 December 2017

स्त्री

एक कहानी है जो रोज़ बनती है 

जब वह घर से निकलती है 
और फुटपाथ पर चलती है
थोड़ी सी कुछ 
ज़िन्दगी सी गुजरती है 

कुछ आँखों में बस्ती है 
घटती है
मिटती है..!

फिर, हंसती है या रोती है
और शाम को ढोती भी है 

अक्सर सुन्ने में आता है 
वो एक कहानी है 
जो रोज़ बदलती है ! 

No comments:

Post a Comment