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Wednesday, 1 April 2020

भूलभुलैया

जी जान से ढूंढ रहीं थी अँखियाँ वो नैया
हो कहीं मुझसी एक भूलभुलैया

उस दिन, एक हुई मुलाकात
जब भी की फिर दिल ने की बात

बंद हो जाएँ आँखें तो सपनों में सजती थी
खुलती आँखें तो सूरज से पहले दिखती थी

ख़ालीपन दरवाज़े पर जब ज़ोर लगता
उड़ता बादल जब भी मेरे सिर पे आता
कामकाज में कट जाये वो दिन था
रात में अक्सर मुझको उसका दिल बुलाता

घूमा उसके संग सुर्ख बरसाती में
हारा जो इकलौता दिल था छाती में 

Friday, 27 March 2020

खिड़की

कदम रखे इसमें
उस दुनिया में झाँका था
दिल की कहाँ चार दीवारी होती है !

देह नहीं है, आवाज़ नहीं है
कोई आस - पास
आती है तब भी मुझ तक
आख़िर उसकी याद

रूह एक पनाह देती है जब भी दिल रोता है
जो होता है, बदौलत उसकी होता है

प्यार मिला नहीं तो क्या मर जाएगा?

उसके कान पढ़ें न मेरी यादें
सब बहकी बातें हैं
दो दुनियाओं का दरवाजा खिड़की होती है |

Thursday, 26 March 2020

कल्पना

हवाओं के गलियारे पार कर
चुप्पी की सीढ़ियों से
बाहों का समंदर सिरआने आया
प्रेम की चादर ओढ़
छुअन की गर्मी बगल में लेटी पूरी रात

चुंबन के संवादों से भीगे थे जज़्बात
देह ने जी भर की थी बहकी बहकी बात
अहसास ने जमकर अपनी चाल चली थी
दिल भी दिल से मिला था पहली बार

रात के सपने ने दिन में गोता लगाया
थी कल्पना साथ, उसने प्यार निभाया

गोई से तने पे उसने एक दिल बनाया
जानती थी मेरा नाम
संग अपना नाम सजाया

Tuesday, 26 June 2018

यादों के शहर में

एक रात चाँद आया तकिए तले
बोला कोई बात नहीं 
मैंने ख़ालीपन में, खुले आकाश में छोड़ दिया ख़ुद को
सबसे नन्ही चिड़िया आई 
सबसे मीठी बोली बोली

क्या पंछी साथ निभाते होंगे?
क्या पंछी दोस्त बनाते होंगे?

समंदर की सबसे प्यारी मछली बोली
रेलगाड़ी में बैठा एक सवाल आया 
खिड़की में खड़ी एक लड़की बोली
"प्यार नहीं"
ओ मेरे साथी, सरहद तो ओहदे की बनाई होती !

यारा, दीवानगी कम है तुझमें
सच कहूँ तो
फिर भी ज़िक्र तुम्हारा होगा
"यादों के शहर में"
यादों का शहर, इक़ हमारा होगा ।