Thursday, 26 March 2020

कल्पना

हवाओं के गलियारे पार कर
चुप्पी की सीढ़ियों से
बाहों का समंदर सिरआने आया
प्रेम की चादर ओढ़
छुअन की गर्मी बगल में लेटी पूरी रात

चुंबन के संवादों से भीगे थे जज़्बात
देह ने जी भर की थी बहकी बहकी बात
अहसास ने जमकर अपनी चाल चली थी
दिल भी दिल से मिला था पहली बार

रात के सपने ने दिन में गोता लगाया
थी कल्पना साथ, उसने प्यार निभाया

गोई से तने पे उसने एक दिल बनाया
जानती थी मेरा नाम
संग अपना नाम सजाया

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