Friday, 30 March 2018

उन दिनों

जब तुम्हरी बातें संग में आती थीं
तो वो खिलकर आसमान बन जाता था
दीवारें जीने लगती थीं, किस्से मचलने लगते थे
वक़्त बीत जाता था

अभी कुछ देर और हमें
साथ चलना है
मेरे कमरे की उदासी मुझे अच्छी नहीं लगती

न बोलता है
न सुनता है
मेरा कमरा न जाने क्यों अब मौन रहता है?

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