Monday, 22 June 2020

रहस्य 
(किसी नए की ओर)


बचपन का एक सपना 
एक बड़ा सा 
बहुत बड़ा सा गोला 
मुझे दबाता था 
हिला-डुला नहीं मैं 
न आँखें खोलीं 
न चिल्लाया 
कोशिश करता, तो भी कुछ न कर पाता था !


म्यार के नीचे का एक बिस्तर 
जिस पर मैं सोता था 
एक मैं,

कितना अच्छा था वो झूठ का गोला 
रात को आता 
दिन में, मैं भूल जाता था 


जब रात पसर जाती है 
मेरे सिरआने एक थका हारा सवाल आकर बैठता है 
इतना सन्नाटा क्यों हैं गलियों में?
लोग ऐसा क्या करते हैं 
सो जाते हैं बेसुध होकर 


उसकी कोई शक्ल, सूरत याद नहीं है 
पर था कुछ 
मुझको बचपन का खौफ़ याद वो ही है 


अब वो गोला बिगड़ गया है 
बिखर गया है 
दिन के उजियारे में फिरता है 
क्यों किसी को उसका खौफ़ नहीं है?


अब मैं बड़ा हो गया हूँ 
उस गोले से दो दो हाथ लड़ूंगा 
आँखें खुली हैं मेरी 
चिल्लाऊंगा अब उस पर 

रात हो या दिन, मैं सोता नहीं हूँ 
मैं जाग रहा हूँ | 

Thursday, 11 June 2020

वज़ह  
(तुम्हारे लिए)


मेरी दिल्लगी में, एक इंच का भी 
फ़ासला नहीं आया है 
वो उतनी ही मुक़म्मल है हमेशा से 

तुमसे पहले 
और तुम्हारे बाद 

मैं जो दरअसल कुछ भी नहीं हूँ   
चाहता था कि मैं जिसके हिस्से आऊं 
पूरा का पूरा आऊं

एवज में खोना क्या, पाना क्या?

जान - पहचान
जुड़ाव  
दोस्ती 
हो या मोहब्बत,
वास्ता... मेरे भीतर का हिसाबी[1] छोर है

मैं चाहता था 
मैं चाहता हूँ 
और चाहूँगा हमेशा 

वास्ता हो तो पूरा हो 
न हो तो, न हो थोड़ा भी | 


[1] - गणितीय, हिसाब-किताब 

Friday, 22 May 2020

मज़दूर

चल के पहुचूँगा खाने में
सोच के यह भी तो इक खाना है
रुक जाता हूँ
मैं एक मोहरा चलने को आगे-पीछे, दाएँ- बाएँ
पाँव बढ़ाता हूँ

बोल दे तो ये आलम रंग बदलता है
कितना फ़र्क़ है
कहने को हमसा एक खाना चलता है
उस हुक्मरान का हर चाल - चलन
उसको सब आज़ादी
पैसा जिसपे आख़िर इंसानियत क्यों हो उसकी अधिकारी?
एक जो सचमुच है अधिकारी
चले तिरछी चाल, काहे की ज़िम्मेदारी
फिर आता है वो अपनी चाल का मदमस्त हाथी

ठीक सामने दुश्मन सेना है इनके
ठीक सामने मेरे मुझसा एक दुश्मन मोहरा है
पहली बार मुझको मेरे जैसा कोई दिखा था
वो भी कर सकेगा कभी तरफ़दारी 

बीज जुगाड़ें
खेत में डालें
सीचें
धूप भी रोंदे, खलिहान लगाएं
फसल उगाएँ
ज़रूरत के सौ रूप तुम्हारी
हमपे है चलने को
इक खाना
हम हैं जो करते हैं तरफ़दारी

कहते सब हैं
हमें भी
अच्छा लगे, कोई करे तरफ़दारी

Friday, 15 May 2020

पुनर्जन्म

इंतज़ार मेरा सबसे प्रिय शब्द है 
आख़िरी सांस तक 
किया है इंतज़ार मैंने तुम्हारा 
जो बचा है 
वो असल में मैं नहीं हूँ 
मैं होता तो तुम्हारे साथ होता | 

हम दुनिया में हर बदलाव झेल सकते हैं 
कैसे देख सकता है कोई प्रेम को बदलते हुए | 

दूसरा हो जाना इस समय की सबसे बड़ी त्रासदी है 
'अलविदा' कहने के बाद आदमी मर जाता है | 

Tuesday, 12 May 2020

रात की बात

कोई बात करूँ
रेलगाड़ी में बैठी बात चली आती है
बेबस ख़याल
लेने स्टेशन बात को जाता है
सवाल बार बार आता है
बात सी वो लड़की, बात छुपा लेती है |

बेमतलब ख़याल एक बार आता होगा?
ख़याल छुपा लेता होगा
उस लड़के की आँखों में ख़याल कोई |

जिस रात नींद नहीं आती
एक रात याद आती है |

जागी थी एक लड़की ख़ातिर मेरे
याद आती है |

Monday, 20 April 2020

रवैया

तुम कहो मेरे दोस्त हो 
और अब हम दोस्त हैं 
कभी कहना आकर अचनाक प्रेम 
मैं तुम्हारे प्रेम में पढ़ जाऊंगा 
सबकुछ इतना सहज है |

Sunday, 19 April 2020

मोड़

बेबुनियाद अभ्यास के ठीक बाद 
आपको आभास होता है 
'प्रेम में प्रयास' और 'प्रेम' असल में दो अलग बातें हैं 
जब कोई मिले और उसके साथ चलने का अहसास हो 
तो मान लेना साथ तुम्हें धोखा दे रहा है 

आसमान को कभी आभास नहीं हो सकता
कोई उसे छू लेना चाहता है 
चाँद को खुद उसके किस्से कहाँ पता होंगे?
हमने गलत तवज्ज़ो देना सीखा है अपनी चाह को 

मैं उड़ने की कल्पना करता हूँ 
'लेकिन उड़ने की कल्पना उड़ान नहीं हो सकती'

सबसे सहज होगी मुलाक़ात 
यक़ीनन सब बदल जायेगा | 

पैग़ाम

न चाहें, दिल पे कुछ बातें लगती हैं 
अतीत की यादें महबूबा की बाहें लगती हैं 

ख़्वाब बिछे थे बिस्तर पर 
रातें सपने ले आईं 
किस्सा है उस रात का ये 
मयखाने में जो रात बिताई 

जब कदम बढ़ाए मैंने, क्यों उसने पीछे चाल चली?
और भला क्या होती बात मुझको उसकी बात खली 

खलल किस्म कोई भी हो 
बीच प्यार के पड़ती है 
ग़र वो तेरी, मेरी है 
कहाँ कभी फिर भरती है 

तिलिस्म अतीत का दिन एक खाक हो जायेगा 
कोई रास्ता नहीं आता दिल तक, ग़र रूठ जाएगा | 

Saturday, 18 April 2020

सवाल

एक जो हर मदहोश को मिल जाता है 
एक के अनगिनत किस्से मन जाने 
करामाती पल और कुछ मयखाने 
याद रहे बस दो अफ़साने 

आये झरोखा, दर-बदर मुँह की खाए 
क्यों आवारा बादल दिल लगाए?

तितली के पीछे मैढ़- मड़ैया रोंदे थे 
बेपरवाह गुस्ताखी कर दिन बीते थे 
उत्तर देना कहाँ विरासत में हिस्से आया 
भूल से मैंने वो किस्सा दोहराया 

बीते पल रेंगता एक सवाल आया 
क्यों की गुस्ताख़ी, क्यों दिल लगाया?

Tuesday, 7 April 2020

नतीजा

कहाँ से आती है आवाज़
कैसे मोहब्बत कहते हैं
प्यार क्यों ऐसे करना सीखा की भनक भी न लगी?

अलगाव की आहट का अंकुर कब फूटा था?
बातें क्यों निगल जाती हैं भावनाएँ
समय को उदासी क्यों खाती है?

प्रेम में, 'हाँ' कैसे हो सकता है इतना कठिन शब्द

जब रात सिरआने से उठेगी
सूरज शरीर को रौंदेगा
सबसे शातिर चोर है अलविदा, साथ खो चुका होगा |